पुनर्नवा के फ़ायदे
प्रायः पुनर्नवा (विषखपरा) को सभी लोग जानते हैं । यह क्षुप जाति की बेल वर्षा ऋतु में ही फैलती है। आयुर्वेद मतानुसार पुष्प के वर्ण भेद से यह तीन प्रकार की होती है-1. श्वेत, 2. लाल और, 3. नीली पुनर्नवा । इनमें श्वेत और रक्त पुनर्नवा बहुतायत से देखने में आती है । औषधि रूप में श्वेत पुनर्नवा विशेष गुणकारी सिद्ध हो चुकी है । इसकी उत्पत्ति कंकरीली और मिट्टी मिली हुई ताकतवर जमीन में होती है । खोदने पर मिट्टी की ताकत के हिसाब से (शकरबन्द के समान) मोटी या पतली (1-2 फुट तक लम्बी) जड़ पाई जाती है। जिस जगह से इसकी जड़ काट दी जाती है, वहाँ एक प्रकार का पीलापन लिए हुए चेप निकलता है। (यह चॅप वस्त्रों में धब्बा डाल देता है) इस कन्द का स्वाद मीठा न होकर कड़वा रहता है । मुख में डालने पर थूक पैदा कर देता है तथा इसको मुख से निकाल देने पर 15-20 मिनट तक ज़ीभ कड़ी और रूखी हो जाती है। पुनर्नवा के पत्तों का रस गरम होता है। इसकी लुगदी में ताम्र होता है। इसका अर्क समस्त प्रकार के नेत्रों के रोगों को नष्ट करने वाला हो जाता है। यदि इसका अधिक मात्रा में सेवन किया जाए तो वमन हो जाता है इसकी पत्ता की भाजी ...