नीम के 51 कमाल के फायदे

नीम के आयुर्वेदिक गुण : neem ke ayurvedic gun in hindi
नीम सुप्रसिद्ध सर्वविदित सर्वत्र पाया जाने वाला त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) को दूर करने की अपार क्षमता से सुशोभित वृक्ष है ।
पुराणों में इसे अमृत तुल्य माना गया है।
नीम वृक्ष का पान्चांग (फल, फूल, पत्ते, जड़ और छाल) का रेशा-रेशा अर्थात् जड़ से शिखर तक वृक्ष औषधीय गुणों से भरपूर है । यही इसके विशेष महत्त्व की बात है, ऐसा बहुत कम वृक्षों के साथ महत्व जुड़ा हुआ है ।
इसकी कोपलें नेत्र रोग, गर्मी, कोढ़ और कफ नाशक होते हैं । इसके पत्ते कृमि, विष, अरूचि और अजीर्ण नाशक होते हैं ।
इसके सूखे हुए पत्ते मनुष्य और कपड़ों (दोनों) की रक्षा करते हैं तथा अनाज में रखने से उसे भी घुनने (कृमियों) से बचाते हैं।
इस वृक्ष के फल (निबौली) बबासीर, प्रमेह, कोढ़, कृमि और गुल्म को शान्त करते हैं। इसके पके फल (निबौली) रक्त, पित्त, कफ, नेत्र रोग, दमा नाशक है ।
इस वृक्ष का फूल (निबौली का फूल) कफ और कृमि नाशक है ।
इस वृक्ष का डन्ठल खाँसी, बबासीर, प्रमेह और कृमिजन्य विकार नाशक गुणों से भरपूर है ।
निबौली की गिरी कोढ़ में विशेष रूप से आरोग्यता प्रदान करने वाली है ।
नीम (निबौली) का तैल कृमि, कोढ़ और त्वचा रोग नाशक और दांत, मस्तक, स्नायु और छाती के दर्द को मिटाने के गुणों से भरपूर है।
नीम मूत्रल है यौनांगों को विकार मुक्त करके पुष्ट और सबल बनाता है। यह चेतना सर्जक है और दिमागी ताकत का असीम भंडार है ।
 यह स्त्रियों के मासिक धर्म को नियमित भी करता है ।
नीम के फायदे और औषधीय प्रयोग : neem ke fayde aur upyog in hindi
1-अजीर्ण- नीम की निबौली खाने से अजीर्ण नष्ट हो जाता है । इसके सेवन से मल निष्कासित होकर रक्त स्वच्छ हो जाता है। रक्त संचार तीव्रता से होने के कारण जठराग्नि तीव्र हो जाती है । परिणामस्वरूप क्षुधा बढ़ जाती है । 

neem ke patti ras tel ke fayde
2-सुन्नपन- शरीर अथवा शरीर का कोई अंग विशेष यदि सुन्न हो गया हो तो नियमित 3-4 सप्ताह के नीम तैल की मालिश से सुन्न नसों में पूर्ण रूपेण चेतना आकर सुन्नपन नष्ट हो जाता है। नीम के बीजों का तैल निकलवाकर मालिश करें ।

3-अफीम खाने की लत- नीम पत्तियों का रस 1-1 चम्मच प्रतिदिन सुबह-शाम पीने से अफीम खाने की लत में कमी आकर धीरे-धीरे छूट जाती है । यदि अफीम खाने की लत अधिक सताये तो भांग का अल्प मात्रा में सेवन कर लिया करें । अफीम के मुकाबले भांग कम हानिकारक है तथा इसका सेवन कभी भी छोड़ा जा सकता है ।

4-अरुचि- अरुचि खाने-पीने की हो अथवा काम धन्धे की, नीम के सूखे पत्तों का चूर्ण बनाकर 1-1 चुटकी प्रत्येक 2-2 घंटे पर दिन में 3-4 बार सेवन करने से नष्ट हो जाती है । इस हेतु नीम की कोपलें भूनकर भी खाई जा सकती है । 

5-हर्निया- अन्डवृद्धि (हर्निया) में नीम, हुरहुर की पत्तियाँ और अमरबेल सभी सममात्रा में लेकर गोमूत्र में घोट-पीसकर अन्डकोषों पर लेप करते रहना अत्यन्त उपयोगी है। ( और पढ़ें – हर्निया के 25 रामबाण घरेलु उपचार)

6-आँखे दुखने पर-नीम की पत्तियों का रस 1-1 बूंद आँखों में डालें । नोट –बच्चों की दुखती आंखों में न डालकर कानों में डालें तथा यदि 1 आँख दुख रही हो तो विपरीत कान (बांयी आँख पर दुखने पर दांये कान में डालें

7-आँखों की जलन- नीम की पत्तियों का रस और पठानी लोध (10-10 ग्राम पीसकर आँखों की पलकों पर लेप करने से आँखों की जलन और लालिमा नष्ट हो जाती है । 

8-आँखों में सूजन- आँखों में सूजन होने पर 10 ग्राम नीम की पत्तियाँ उबालकर 5 ग्राम फिटकरी में घोलकर दिन में तीन बार लेप करना लाभप्रद है।

9-आग से जल जाने पर- नीम तैल लगाना उपयोगी है। नीम की 50 ग्राम कोंपले तोड़कर 250 ग्राम खौलते तैल में इतना पकायें कि नीम की कोपलें जल जायें (किन्तु जलकर राख न हों) तदुपरान्त 1-2 बार छानकर सुरक्षित रखलें और लगायें । 

11-नीम का मरहम- 250 ग्राम नीम के तैल में 125 ग्राम वैक्स (मोम), नीम की हरी पत्तियों का रस 1 किलो, नीम की जड़ की छाल का चूरा 50 ग्राम और नीम की पत्तियों की राख 25 ग्राम डालें । तैल और नीम का रस हल्की आग पर इतना पकायें कि तैल आधा या इससे भी कम रह जाए। फिर इसी में मोम डाल दें । जब तैल और मोम एकजान हो जाए तो छाल का चूरा और पत्तियों की राख भी मिला दें । यह प्रत्येक प्रकार का घाव भरने हेतु रामबाण मरहम तैयार हो गया।

12-पड़वाल- नीम की हरी पत्तियां, भीमसैनी कपूर, जस्ता भस्म, लाल चन्दन का बुरादा 10-10 ग्राम और शुद्ध रांगा 50 ग्राम को किसी लोहे के पात्र (कड़ाही) में खूब घोटकर सुरमा बनाकर आंखों में लगाने से पड़वाल (आंखों के बालों का आंखों के अन्दर की ओर जाना) जड़मूल से नष्ट हो जाता है।

13-उपदंश- आतशक(उपदंश) में नीम की पत्तियों का रस 10 ग्राम अथवा नीम का तैल 5 ग्राम नित्य पियें और यौनांगों पर नीम तैल की मालिश करें । अति उपयोगी योग है। 

14-आधासीसी- नीम की पत्तियाँ, काली मिर्च और चावल 25-25 ग्राम घोट पीसकर नसवार बनालें । सूरज निकलने से पूर्व ही 1-1 चुटकी यह नसवार लेकर नथुनों से ऊपर खींचें । मात्र 1 सप्ताह के नित्य प्रयोग से पुराने से पुराना आधासीसी का रोग जड़ से भाग जाएग

15-आँव आने पर – नीम पत्तियों का आधा कप काढा अथवा पत्ती का 2 या ढाई ग्राम चूर्ण या पत्ती का दस ग्राम रस या छाल का चूर्ण डेढ़ से दो ग्राम तक अथवा फल, फूल छाल, डन्ठल और पत्ती अर्थात् पंचांग का चूर्ण हो तो मात्र दो ग्राम सेवन करने से लाभ हो जाता है ।

16-वमन- 20 ग्राम नीम की पत्तियाँ पीसकर आधा कप पानी में घोलकर 5 दाने काली मिर्च के भी मिलालें । इसे पीने से किसी भी कारण से उल्टियां (वमन या कै) आ रही हो, शर्तिया शान्त हो जाती हैं । 

17-एक्जिमा- नीम की छाल, मजीठ, पीपल की छाल, नीम वृक्ष पर चढ़ी गिलोय प्रत्येक 10-10 ग्राम लेकर काढ़ा बनाकर आधा-आधा कप सुबह-शाम पीने से एक्जिमा नष्ट हो जाता है।

18-दो किलो नीम पत्ती का रस, 500 मि.ली. सरसों का तैल, आक का दूध, लाल कनेर की जड़ और काली मिर्च 5-5 ग्राम लेकर हल्की आग पर पकाकर तैल मात्र शेष रहने पर छानकर सुरक्षित रखलें । इस तैल को लगाने से एक्जिमा समूल नष्ट हो जाता है तथा त्वचा पर कोई दाग शेष नहीं रहता है।

19-कब्ज- प्रात: (सूर्योदय से पूर्व) कुल्ला करके नीम की 10 ग्राम पत्तियाँ घोटकर पानी में मिलाकर पीने से कब्ज मिटकर पेट स्वच्छ हो जाता है 

20-कण्ठमाला – महानिम्ब (बकायन) के पत्तों और छाल का काढ़ा पीने से और छाल की पुल्टिस बनाकर गले पर बांधने से कण्ठमाला रोग जड़ मूल से मिट जाता है । 

21-कनफोड़े- कच्ची निबौली को चबाने से कर्णमूल (कनफोड़े) ठीक हो जाते हैं अथवा नीम के बीजों को नीम के ही तैल में पकाकर इसमें फुलाया हुआ नीला थोथा पीसकर मरहम बनाकर लगायें ।
नोट-नीला थोथा जहर है अतः प्रयोग के बाद हाथ अवश्य साबुन से खूब भली-भांति घोकर स्वच्छ करलें ।

22-कनखजूरे के विष में- नीम की पत्तियाँ घोटकर सैंधा नमक मिलाकर लेप करने से (जहाँ कनखजूरे ने काटा हो वहाँ लेप करें) विष नष्ट हो जाता है ।

23- कानों के कीड़े – नीम पत्तियों का 25 ग्राम रस नमक मिलाकर गुनगुना करके कानों में टपकाने से कानों से समस्त कीड़े निकल जाते हैं । आवश्यकता पड़ने पर (कान में कीड़े होने पर) यह क्रिया दूसरे दिन भी की जा सकती है। 

24- कानों का बहना- 50 ग्राम सरसों के तेल में 25-30 ग्राम नीम के पत्ते पकावें । (इसी में 5 ग्राम पिसी हल्दी डाल लें । तदुपरान्त इस तैल को छानकर 1 छोटा चम्मच शहद मिलाकर शीशी में सुरक्षित रखलें । इस तैल को 3-4 दिनों कान में टपकाने से कानों की बहना और दुर्गन्ध निकलना शर्तिया दूर हो जाता है । अथवा नीम के तैल में शहद मिलाकर रूई की बत्ती से कान में फेरने मात्र से ही पीव आना और दुर्गन्ध निकलना, दर्द होना मिट जाता है । 

25-कान सुन्न पड़ जाना – नीम पत्ती का रस 1 चम्मच पीने से तथा 2-2 बूंद कानों में डालने से कान सुन्न पड़ जाने का रोग दूर हो जाता है ।

26-सफेद कोढ़- नीम की फूल-पत्ती और निबौली पीसकर 40 दिन निरन्तर शर्बत बनाकर पीने से सफेद कोढ़ से मुक्ति मिल जाती है । 

27- गलित कोढ़- नीम का गोंद नीम के ही रस में ही पीस कर पीने से गलित कोढ़ नष्ट हो जाता है । कोढ़ (लेप्रोसी) से ग्रसित रोगी को नीम वृक्ष के नीचे ही रहने, खाने, पीने और नीम की पत्तियां बिछावन की भांति बिछाकर सोना अत्यन्त ही लाभप्रद है घावों पर नीम का तैल लगाना अथवा शरीर पर मालिश करना, नीम की पत्तियों का रस पीना अथवा नीम से झरने वाला मद (50 ग्राम) तक पीना हितकर है। नीम की पत्ती का रस पानी में मिलाकर स्नान करना तथा बिस्तर से हटायी गयी नीम पत्तियों को जलाकर (धूनी लगाने से) वातावरण स्वच्छ रहता है । जली हुई पत्तियों की राख नीम के तैल में मिलाकर घावों पर लगाना भी लाभकारी है ।

28- मच्छर भगाना – नीम की सूखी पत्तियों के ढेर में गन्धक चूर्ण डालकर आग लगाने से खटमल और मच्छर भाग जाते हैं। 

29-गले में जलन- पेट की खराबी के कारण होने वाले गले की दाह में नीम के रस में निबौली घोटकर शर्बत की भांति पीना लाभप्रद है।

30- बलगमी खाँसी में – नीम के पत्तों की भस्म शहद में मिलाकर चाटना अत्यन्तु लाभकारी है । नीम भस्म को सौंठ, अजवायन, काली मिर्च, पुदीना एवं अदरक रस में घोटकर चाटने से तुरन्त लाभ होता है । इस प्रयोग से श्वास नली के समस्त अवरोध और दूषण शान्त हो जाते है । 

31-खून की खराबी- 30 ग्राम नीम की कोपलों का रस तीन दिन पीने से खून की खराबी दूर हो जाती है। 

32-खुजली में – नीम और मेंहदी के पत्तों को एक साथ रगड़कर रस निकाल कर 25 ग्राम की मात्रा में पीना तथा शेष बचे रस को नारियल के तैल में भूनकर छानकर शरीर पर मलना लाभकारी है। अथवा नीम का पंचांग (बीज, फूल, फल और पत्ते तथा जड़) समान मात्रा में पीसकर 4 चम्मच सरसों के तैल में उक्त चूरा हल्की आग पर तपाकर (नीम ज़लने की गन्ध फैलते ही और धुंआ उठते हुए ही) उतारकर, छानकर साफ-स्वच्छ शीशी में सुरक्षित रखलें। इस तेल की मालिश से मात्र खुजली ही नहीं, वरन् त्वचा सम्बन्धी समस्त विकार नष्ट हो जाते हैं । 

33- खूनी दस्त- पतझड़ के मौसम में नीम छाल को पीसकर छानकर दो ग्राम की मात्रा में 3-3 घंटे पर ताजे पानी से सेवन करने से खूनी दस्त रुक जाते हैं।

34-गंजापन- नीम तैल की निरन्तर काफी दिनों तक मालिश करते रहने से गंजापन नष्ट हो जाता है। 

35- गठिया – 25 ग्राम सरसों के तैल को पकाकर (खूब खौलने तक पकायें) उसमें 10 ग्राम नीम की कोपलें डालकर काली पड़ने दें (जलने से पहले ही उतार लें) फिर इसवने छानकर तैल को पुनः गुनगुना करके गठिया से आक्रान्त अंगों पर मालिश करें तथा इसी तैल से शाक-भाजी बनाकर खायें । गठिया के लिए अक्सीर योग है। अथवा महानिम्ब (बकायन) के बीज को पीसकर दो ग्राम की मात्रा में गुनगुने पानी के साथ सेवन करें । सुन्न पड़ गये अंगों को इस योग के सेवन करने से चैतन्यता मिलती है। 

36-शरीर में गर्मी- नीम पत्तियों के रस में मिश्री मिलाकर सुबह-शाम पीने से शरीर (देह) की गर्मी (शरीर में गर्मी का जोर) शान्त हो जाता है । 

37-गर्मी से बुखार होने पर- नीम की छाल, गिलोय, लाल चन्दन, धनिया और कुटकी सम मात्रा में लेकर जौकुट कर काढ़ा बनाकर 20 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन (तीन दिन में तीनखुराके) ले इससे अधिक सेवन कदापि न करें। यह ‘गड्न्यादि क्वाथ’ कहलाता है । मात्र इतने सेवन से ही बुखार भाग जाता है। और प्यास भी शान्त हो जाती है । यह उपचार रक्त को ठण्डा करता है ।

38-गले की जलन- नीम की पत्तियों का रस निकालकर हल्का गर्म करके (इसमें 5-7 बँट शहद भी मिला सकते हैं) गरारें (कुल्ला) करने से गले की जलन शान्त हो जाती है तथा कफ को हटाने में तो यह योग लाभप्रद है ।

39-गिल्टियों और सूजन में-नीम की पत्तियों को दरड़ लें (बारीक न पीसे) और नमक डालकर कड़वे तैल में पकायें, इसमें एक चुटकी पिसी हल्दी मिलाकर पुल्टिस तैयार कर किसी कपड़े में पोटली बनाकर गिल्टियों और सूजन पर हल्कीहल्की टकोर (सेंक) करें । दो दिन में ही आराम मिलने लगेगा ।।
नोट–टकोर करने पर पहले तो सूजन बढती हुई लगेगी, ऐसा खून संचार की क्रिया के कारण होता है । मगर बाद में शर्तिया लाभ होगा। अत: घबरायें नहीं और प्रयोग जारी रखें।

40- जोड़ों में दर्द –महानीम (बकायन) के पत्तों का रस पानी में मिलाकर पीने और जड़ की छाल को पीसकर लेप करने से गृधसी रोग (कमर से निचले जोड़ों में दर्द और जकड़न) नष्ट हो जाता है ।

41-घमौरियाँ- नीमरस में जरा सा नमक (सम्भव हो तो पांचों पिसे हुए नमक) मिलाकर दिन में 4 बार पीते रहने से घमौरियाँ नष्ट हो जाती हैं तथा गर्मी, खुश्की नहीं होती है और पित्ती भी नहीं निकलती है।

42-पित्ती – नीम के तैल में कपूर की टिकिया घोलकर ठण्डी हवा और छांव में बैठकर (धूप के असर से होने वाली पित्ती निकलने पर) मालिश करना तथा आधा घंटे के पश्चात् स्नान करना अत्यधिक लाभप्रद है ।

43-घाव- नीम की पत्तियों का रस और सरसों का तैल 10-10 ग्राम लेकर आग पर इतना पकायें कि रस जल जाए, तेल मात्र शेष रहे । इस तैल को घाव पर लगाना इतना अधिक गुणकारी है कि ऐलोपैथी की कीमती से कीमती घाव भरने का आयन्टमैन्ट (मलहम) इसका मुकाबला नहीं कर सकता है।

44-सोरायसिस- 40 दिनों तक निरन्तर नीम क्वाथ पीने से और त्वचा पर नीम का तेल लगाते रहने से चम्बल रोग (सोरायसिस) जड़ से नष्ट हो जाता है ।

45-त्वचा रोग – बहार के मौसम में प्रतिदिन नीम की 5 कोपलें चबाते रहने से अथवा 1 हफ्ता तक बेसन की रोटी में नीम की कोपले कुतरकर मिला दें तथा घी में खूब तर करके खाने से 1 साल तक त्वचा रोगों से बचाव हो जाता है ।

46- चेचक रोग- नीम की 7 लाल पत्तियाँ और 7 काली मिर्च के दाने प्रतिदिन चबाने से अथवा नीम और बहेड़े के बीज तथा हल्दी 5-5 ग्राम पीसकर ताजा पानी में घोलकर 1 सप्ताह पीने से 1 साल तक चेचक रोग से बचाव हो जाता है ।

47- बुखार- हरड़, बहेड़ा, आँवला का छिलका, सौंठ, पीपल, अजवायन, सैंधा और काला नमक प्रत्येक 10-10 ग्राम, काली मिर्च 1 ग्राम नीम के पत्ते आधा किलो और जौ क्षार 20 ग्राम को कूट पीस छानकर सुरक्षित रखलें । 3 से 5 ग्राम की मात्रा में फेंकी मारकर गुनगुने पानी के साथ पीने से चौथैया बुखार तो भाग ही जाता है इसका सेवन प्रत्येक प्रकार की ज्वरों में भी उपयोगी है ।

48- जलोदर रोग- सुबह-सुबह नीम की छाल का रस निकालकर 25 ग्राम की मात्रा में पीने के दो घंटे बाद घी की चूरी (परांठे की चूरी बनाकर घी में सानकर) 1 सप्ताह तक निरन्तर खाने (पानी न पियें अथवा कम से कम पियें) से जलोदर रोग नष्ट हो जाता है ।

49-कील मुँहासे- जवानी के कील मुँहासे मुरझाकर दाग छोड़ गए हों तो नीम के बीज सिरके में पीसकर 5-7 दिन दागों पर लेप करने से लाभ हो जाता है ।

50- जहरवा- नीम का मद (गोंद) दो ग्राम प्रतिदिन खाने से जहरवाद नष्ट हो जाता है।

51- जुएं- नीम का तैल सिर में मालिश करने से जुएं लीखें नष्ट हो जाती है ।

नीम के नुकसान : neem ke nuksan in hindi
सामान्य खुराक (मात्रा) में नीम के उपयोग से दुष्प्रभाव नहीं होते हैं।
नवजात शिशुओं को नीम का सेवन नहीं कराना चाहिये ।
गर्भावस्था में महिलायें नीम का सेवन वैद्यकीय सलाहानुसार करें ।
अस्वीकरण: इस लेख में उपलब्ध जानकारी का उद्देश्य केवल शैक्षिक है और इसे चिकित्सा सलाह के रूप में नहीं ग्रहण किया जाना चाहिए। कृपया किसी भी जड़ी बूटी, हर्बल उत्पाद या उपचार को आजमाने से पहले एक विशेषज्ञ चिकित्सक से संपर्क करें।

*ये पोस्ट सिर्फ जानकारी के लिए हैं कोई भी जड़ी बूटियां इस्तेमाल से पहले अपने हाकिम या वैद्य से जानकारी जरूर लीजिए पोस्ट के दुरुपयोग के लिए गौसिया एंटरप्राइजेज - हाकिम जमीर शेख जिम्मेदार नहीं*
*_(खुद से दवाइया/जड़ी बूटियां इस्तेमाल करना हानिकार हो सकता है)_*
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*_Dr. जमिर शेख (DUMS_MLVV_Delhi)_*

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